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वन पर्व
अध्याय १०४
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्तस्तु विप्रेन्द्रो धर्मराज्ञा महात्मना |  ५   क
कथय़ामास माहात्म्यं सगरस्य महात्मनः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति