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शान्ति पर्व
अध्याय १४
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वैशम्पाय़न उवाच
यथास्तां संमतौ राज्ञां पृथिव्यां राजसत्तमौ |  ३७   क
मान्धाता चाम्वरीषश्च तथा राजन्विराजसे ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति