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उद्योग पर्व
अध्याय १०४
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नारद उवाच
विश्वामित्रस्तु शिष्यस्य गालवस्य तपस्विनः |  १९   क
शुश्रूषय़ा च भक्त्या च प्रीतिमानित्युवाच तम् |  १९   ख
अनुज्ञातो मय़ा वत्स यथेष्टं गच्छ गालव ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति