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उद्योग पर्व
अध्याय १०४
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जनमेजय़ उवाच
ज्ञातीनां दुःखकर्तारं वन्धूनां शोकवर्धनम् |  २   क
सुहृदां क्लेशदातारं द्विषतां हर्षवर्धनम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति