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उद्योग पर्व
अध्याय १०४
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नारद उवाच
दक्षिणां कां प्रय़च्छामि भवते गुरुकर्मणि |  २१   क
दक्षिणाभिरुपेतं हि कर्म सिध्यति मानवम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति