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वन पर्व
अध्याय १६४
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अर्जुन उवाच
न तां भासय़ते सूर्यो न शीतोष्णे न च क्लमः |  ४३   क
रजः पङ्को न च तमस्तत्रास्ति न जरा नृप ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति