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उद्योग पर्व
अध्याय १०४
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नारद उवाच
जानमानस्तु भगवाञ्जितः शुश्रूषणेन च |  २३   क
विश्वामित्रस्तमसकृद्गच्छ गच्छेत्यचोदय़त् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति