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उद्योग पर्व
अध्याय १०४
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जनमेजय़ उवाच
कथं नैनं विमार्गस्थं वारय़न्तीह वान्धवाः |  ३   क
सौहृदाद्वा सुहृत्स्निग्धो भगवान्वा पितामहः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति