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भीष्म पर्व
अध्याय १०४
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सञ्जय़ उवाच
काम्वोजराजो वलवांस्ततः पश्चात्सुदक्षिणः |  १४   क
मागधश्च जय़त्सेनः सौवलश्च वृहद्वलः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति