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भीष्म पर्व
अध्याय १०४
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सञ्जय़ उवाच
ततः प्रववृते युद्धं तव तेषां च भारत |  १७   क
अन्योन्यं निघ्नतां राजन्यमराष्ट्रविवर्धनम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति