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द्रोण पर्व
अध्याय १०८
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सञ्जय़ उवाच
महावेगैः प्रसन्नाग्रैः शातकुम्भपरिष्कृतैः |  १८   क
आहनद्भरतश्रेष्ठ भीमं वैकर्तनः शरैः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति