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भीष्म पर्व
अध्याय १०४
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सञ्जय़ उवाच
निजघ्ने समरे क्रुद्धो हस्त्यश्वममितं वहु |  ३१   क
रथिनोऽपातय़द्राजन्रथेभ्यः पुरुषर्षभः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति