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भीष्म पर्व
अध्याय १०४
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सञ्जय़ उवाच
शक्राशनिसमस्पर्शान्विमुञ्चन्निशिताञ्शरान् |  ३४   क
दिक्ष्वदृश्यत सर्वासु घोरं सन्धारय़न्वपुः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति