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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
अथ मत्स्यो मनुं दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत |  १४   क
भगवन्साधु मेऽद्यान्यत्स्थानं सम्प्रतिपादय़ ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति