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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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नीलकण्ठ उवाच
कश्चित्तव रुजं कर्ता मत्प्रसादात्कथञ्चन |  ७८   क
अपि चेत्समरं गत्वा भविष्यसि ममाधिकः ||  ७८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति