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भीष्म पर्व
अध्याय १०४
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सञ्जय़ उवाच
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शिखण्डी क्रोधमूर्छितः |  ४२   क
उवाच भीष्मं समरे सृक्किणी परिलेलिहन् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति