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भीष्म पर्व
अध्याय १०४
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सञ्जय़ उवाच
दिव्यश्च ते प्रभावोऽय़ं स मय़ा वहुशः श्रुतः |  ४४   क
जानन्नपि प्रभावं ते योत्स्येऽद्याहं त्वय़ा सह ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति