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भीष्म पर्व
अध्याय १०४
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सञ्जय़ उवाच
ध्रुवं च त्वा हनिष्यामि शपे सत्येन तेऽग्रतः |  ४६   क
एतच्छ्रुत्वा वचो मह्यं यत्क्षमं तत्समाचर ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति