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अनुशासन पर्व
अध्याय ६६
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भीष्म उवाच
धन्यं यशस्यमाय़ुष्यं जलदानं विशां पते |  १७   क
शत्रूंश्चाप्यधि कौन्तेय़ सदा तिष्ठति तोय़दः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति