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कर्ण पर्व
अध्याय ५४
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विशोक उवाच
रविप्रभं वज्रनाभं क्षुरान्तं; पार्श्वे स्थितं पश्य जनार्दनस्य |  २८   क
चक्रं यशो वर्धय़त्केशवस्य; सदार्चितं यदुभिः पश्य वीर ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति