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द्रोण पर्व
अध्याय १०४
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सञ्जय़ उवाच
पुनर्घोरेण नादेन पाण्डवस्य महात्मनः |  १३   क
समरे सर्वय़ोधानां धनूंष्यभ्यपतन्क्षितौ ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति