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द्रोण पर्व
अध्याय १०५
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द्रोण उवाच
स रथं प्राप्य तं भ्रातुर्दुर्योधनहय़ाञ्शरैः |  ३०   क
वहुभिस्ताडय़ामास ते हताः प्रापतन्भुवि ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति