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द्रोण पर्व
अध्याय १०४
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सञ्जय़ उवाच
तस्य कर्णो महेष्वासः साय़कांश्चतुरोऽक्षिपत् |  १८   क
असम्प्राप्तांस्तु तान्भीमः साय़कैर्नतपर्वभिः |  १८   ख
चिच्छेद वहुधा राजन्दर्शय़न्पाणिलाघवम् ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति