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द्रोण पर्व
अध्याय १०४
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सञ्जय़ उवाच
चिच्छेद चापं कर्णस्य मुष्टिदेशे महारथः |  २०   क
विव्याध चैनं वहुभिः साय़कैर्नतपर्वभिः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति