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द्रोण पर्व
अध्याय १०४
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सञ्जय़ उवाच
सारथिं चास्य भल्लेन प्राहिणोद्यमसादनम् |  २७   क
वाहांश्च चतुरः सङ्ख्ये व्यसूंश्चक्रे महारथः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति