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द्रोण पर्व
अध्याय १०४
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सञ्जय़ उवाच
तमन्तर्धाय़ निनदं ध्वनिर्भीमस्य नर्दतः |  ३२   क
अश्रूय़त महाराज सर्वसैन्येषु भारत ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति