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आदि पर्व
अध्याय १०५
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वैशम्पाय़न उवाच
तं कृताञ्जलय़ः सर्वे प्रणता वसुधाधिपाः |  १६   क
उपाजग्मुर्धनं गृह्य रत्नानि विविधानि च ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति