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आदि पर्व
अध्याय १०५
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युद्ययुस्तं सम्प्राप्तं सर्वे भीष्मपुरोगमाः |  २३   क
ते नदूरमिवाध्वानं गत्वा नागपुरालय़ाः |  २३   ख
आवृतं ददृशुर्लोकं हृष्टा वहुविधैर्जनैः ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति