आदि पर्व  अध्याय १०५

वैशम्पाय़न उवाच

प्रमृद्य परराष्ट्राणि कृतार्थं पुनरागतम् |  २६   क
पुत्रमासाद्य भीष्मस्तु हर्षादश्रूण्यवर्तय़त् ||  २६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति