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आदि पर्व
अध्याय १०५
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वैशम्पाय़न उवाच
स तूर्यशतसङ्घानां भेरीणां च महास्वनैः |  २७   क
हर्षय़न्सर्वशः पौरान्विवेश गजसाह्वय़म् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति