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आदि पर्व
अध्याय १०५
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वैशम्पाय़न उवाच
सर्वराजसु विख्याता रूपेणासदृशी भुवि |  ५   क
पाण्डोरर्थे परिक्रीता धनेन महता तदा |  ५   ख
विवाहं कारय़ामास भीष्मः पाण्डोर्महात्मनः ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति