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आदि पर्व
अध्याय १३५
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वैशम्पाय़न उवाच
चक्रे च वेश्मनस्तस्य मध्ये नातिमहन्मुखम् |  १७   क
कपाटय़ुक्तमज्ञातं समं भूम्या च भारत ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति