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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
औद्भिदाः स्वेदजाश्चैव अण्डजाश्च जराय़ुजाः |  २०   क
जज्ञे तात तथा सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति