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द्रोण पर्व
अध्याय १६८
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सञ्जय़ उवाच
आविध्य च गदां गुर्वीं भीमां काञ्चनमालिनीम् |  १८   क
गिरिप्रकाशान्क्षितिजान्भञ्जेय़मनिलो यथा ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति