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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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भीष्म उवाच
आत्मनोऽध्रुवतां पश्यंस्तांस्त्वं किमनुशोचसि |  १८   क
वुद्ध्या चैवानुवुध्यस्व ध्रुवं हि न भविष्यसि ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति