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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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भीष्म उवाच
अपि चेन्महतो वित्ताद्विप्रमुच्येत पूरुषः |  २१   क
नैतन्ममेति तन्मत्वा कुर्वीत प्रिय़मात्मनः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति