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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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भीष्म उवाच
अनागतं यन्न ममेति विद्या; दतिक्रान्तं यन्न ममेति विद्यात् |  २२   क
दिष्टं वलीय़ इति मन्यमाना; स्ते पण्डितास्तत्सतां स्थानमाहुः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति