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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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मुनिरु उवाच
अनर्हानपि चैवान्यान्मन्यते श्रीमतो जनान् |  ३१   क
एतस्मात्कारणादेतद्दुःखं भूय़ोऽनुवर्तते ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति