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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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मुनिरु उवाच
ईर्ष्यातिच्छेदसम्पन्ना राजन्पुरुषमानिनः |  ३२   क
कच्चित्त्वं न तथा प्राज्ञ मत्सरी कोसलाधिप ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति