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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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मुनिरु उवाच
श्रिय़ं च पुत्रपौत्रं च मनुष्या धर्मचारिणः |  ३४   क
त्यागधर्मविदो वीराः स्वय़मेव त्यजन्त्युत ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति