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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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मुनिरु उवाच
वहु सङ्कसुकं दृष्ट्वा विवित्सासाधनेन च |  ३५   क
तथान्ये सन्त्यजन्त्येनं मत्वा परमदुर्लभम् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति