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आदि पर्व
अध्याय ११२
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ा हीना क्षणमपि नाहं जीवितुमुत्सहे |  २१   क
प्रसादं कुरु मे राजन्नितस्तूर्णं नय़स्व माम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति