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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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मुनिरु उवाच
अर्थाय़ैव हि केषाञ्चिद्धननाशो भवत्युत |  ३८   क
अनन्त्यं तं सुखं मत्वा श्रिय़मन्यः परीक्षते ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति