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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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मुनिरु उवाच
कृच्छ्राल्लव्धमभिप्रेतं यदा कौसल्य नश्यति |  ४०   क
तदा निर्विद्यते सोऽर्थात्परिभग्नक्रमो नरः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति