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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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मुनिरु उवाच
धर्ममेकेऽभिपद्यन्ते कल्याणाभिजना नराः |  ४१   क
परत्र सुखमिच्छन्तो निर्विद्येय़ुश्च लौकिकात् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति