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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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मुनिरु उवाच
जीवितं सन्त्यजन्त्येके धनलोभपरा नराः |  ४२   क
न जीवितार्थं मन्यन्ते पुरुषा हि धनादृते ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति