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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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मुनिरु उवाच
सञ्चय़े च विनाशान्ते मरणान्ते च जीविते |  ४४   क
संय़ोगे विप्रय़ोगान्ते को नु विप्रणय़ेन्मनः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति