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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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मुनिरु उवाच
अन्येषामपि नश्यन्ति सुहृदश्च धनानि च |  ४६   क
पश्य वुद्ध्या मनुष्याणां राजन्नापदमात्मनः |  ४६   ख
निय़च्छ यच्छ संय़च्छ इन्द्रिय़ाणि मनो गिरम् ||  ४६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति