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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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मुनिरु उवाच
अल्पमिच्छन्नचपलो मृदुर्दान्तः सुसंशितः |  ४८   क
व्रह्मचर्योपपन्नश्च त्वद्विधो नैव मुह्यति ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति