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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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मुनिरु उवाच
न त्वेव जाल्मीं कापालीं वृत्तिमेषितुमर्हसि |  ४९   क
नृशंसवृत्तिं पापिष्ठां दुःखां कापुरुषोचिताम् ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति