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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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मुनिरु उवाच
अपि मूलफलाजीवो रमस्वैको महावने |  ५०   क
वाग्यतः सङ्गृहीतात्मा सर्वभूतदय़ान्वितः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति